Thursday, 2 November 2017

Hindi Poetry, Sahar ke khwab se

सहर के ख़्वाब से आँखें खुलीं जो रात मेरी,
कटी पतंग, नज़र आयी मुझको जात मेरी..

दुखों ने नन्हीं -सी जाँ को कुछ ऐसा घेरा है,
उलझ गई है मसाइब (आपत्ति) में काइनात मेरी..

वो मेरे हाले-ज़ुबों से भी प्यार करता है,
ठहर गई हैं मेरी खामेयाँ (अवगुण) सिफात ( गुण) मेरी..

मेरा ही हाल न उसके बगैर बिगड़ेगा,
बहुत रुलाएँगी उसको भी बात-बात मेरी..

तलाशे-रिज़्क ने जमने दिये न पाँव कभी,
ख़ते – ग़ुबार बनी जा रही है जात मेरी..

नये दरख़्तों ने महफूज कर लिया है मुझे,
कि दास्तानें हैं तहरीर पात-पात मेरी..

ज़मीं पे रह के भी मेहदी (Name) मैं अर्श-पैमा हूँ,
बिसाते-वक़्त पे मुमकिन नहीं है मात मेरी

– शौकत मेहदी

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Hindi Poetry, Itna batla ke

इतना बतला के मुझे हरजाई हूँ मैं यार कि तू,
मैं हर इक शख्स से रखता हूँ सरोकार के तू..

कम-सबाती मेरी हरदम है मुखातिब ब-हबाब,
देखें तो पहले हम उस बहर से हों पार के तू..

ना-तवानी मेरी गुलशन में ये ही बहसें है,
देखें ऐ निकहत-ए-गुल हम हैं सुबुक-बार के तू..

दोस्ती कर के जो दुश्मन हुआ तू जुरअत का,
बे-वफा वो है फिर ऐ शोख सितम-गार के तू।

– क़लंदर बख़्श ‘ज़ुरअत’

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Hindi Poetry, Unse Door Rehne ka

उस ने दूर रहने का मशवरा भी लिखा है,
साथ ही मुहब्बत का वास्ता भी लिखा है,

उस ने ये भी लिखा है मेरे घर नहीं आना,
साफ़ साफ़ लफ़्ज़ों में रास्ता भी लिखा है,

कुछ हरूफ लिखे हैं ज़ब्त की नसीहत में,
कुछ हरूफ में उस ने हौसला भी लिखा है,

शुक्रिया भी लिखा है दिल से याद करने का,
दिल से दिल का है कितना फ़ासला भी लिखा है,

क्या उसे लिखें मोहसिन क्या उसे कहें मोहसिन,
जिस ने कर के बे-जान, फिर जान-ए-जाँ भी लिखा है।

– मोहसिन नक़वी

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Hindi Poetry, Jaagti Aankho hi se

जागती आँखों ही से सोती रहती हूँ,
मैं पलकों में खाव्ब पिरोती रहती हूँ..

तेजाबी बारिश के नक्श नहीं मिटते,
मैं अश्कों से आँगन धोती रहती हूँ..

मैं खुशबू की कद्र नहीं जब कर पाती,
फूलों से शर्मिंदा होती रहती हूँ..

जब से गहराई के खतरे भांप लिए,
बस साहिल पर पाँव भिगोती रहती हूँ ..

मैं भी नुसरत उसके लम्स की गर्मी से,
कतरा कतरा दरिया होती रहती हूँ

– नुसरत मेंहदी

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Hindi Poetry, Jaagti Aankho hi se

जागती आँखों ही से सोती रहती हूँ,
मैं पलकों में खाव्ब पिरोती रहती हूँ..

तेजाबी बारिश के नक्श नहीं मिटते,
मैं अश्कों से आँगन धोती रहती हूँ..

मैं खुशबू की कद्र नहीं जब कर पाती,
फूलों से शर्मिंदा होती रहती हूँ..

जब से गहराई के खतरे भांप लिए,
बस साहिल पर पाँव भिगोती रहती हूँ ..

मैं भी नुसरत उसके लम्स की गर्मी से,
कतरा कतरा दरिया होती रहती हूँ

– नुसरत मेंहदी

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Wednesday, 1 November 2017

True Dard Status | टूटने का दर्द

टूटता हुआ तारा सबकी दुआ पूरी करता है..
क्यों के उसे टूटने का दर्द मालूम होता है….

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Tuesday, 31 October 2017

True Line on Waqt

उड़ जायेंगे तस्वीरों से, रंगो की तरह हम
वक़्त की टहनी पर हैं, परिंदो की तरह हम

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