एक सच्ची शहादत के लिए।
बुजुर्गों की विरासत के लिए।
घर छोड़ा, गांव छोड़ा, छोड़ा जहां,
सरहदों पर हिफाजत के लिए ।
~ अब्दुल रहमान अंसारी (रहमान काका)
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एक सच्ची शहादत के लिए।
बुजुर्गों की विरासत के लिए।
घर छोड़ा, गांव छोड़ा, छोड़ा जहां,
सरहदों पर हिफाजत के लिए ।
~ अब्दुल रहमान अंसारी (रहमान काका)
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एक अजनबी के घर में गुजारी है जिंदगी |
लगता है जैसे सफर में गुजारी है जिंदगी |
ये और बात है कि मैं तुझसे दूर हूँ,
लेकिन तेरे अशर में गुजारी है जिंदगी |
~ अब्दुल रहमान अंसारी (रहमान काका)
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महफिल में हम भी उनको पहचानने से मुकर गए,
महफिल में हम भी उनको पहचानने से मुकर गए,
जब वह भी अनदेखा कर, नजदीक से गुजर गए ll
~ रवि कुमार गहतराज
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पर तुम्हारी याद बहुत आयी
पर तुम्हारी याद बहुत आयी
बीते हुए लम्हो के साथ फिर लौट आयी
पर तुम्हारी याद बहुत आयी
किताबों से भी निकल कर आयी
कभी खामोसी के साथ आयी
पर तुम्हारी याद बहुत आयी
कभी आँखों में आंसू बनकर आयी
तो कभी छू लेती मेरे दिल की गहरायी
पर तुम्हारी याद बहुत आयी
~ मनीषा सोलंकी
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मुझे मय्यसर समझ कर.. मेरी तौहीन ना कर…
सितारे भी टूटते हैं… वस्ल-ए-ज़मी की चाहत में।
– जूली जायसवाल “ज़न्नत”
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ग़म है या ख़ुशी है, पर मेरी ज़िन्दगी हैं तू..
आफतों के दौर में, चैन की घडी हैं तू..
मेरी रात का चराग, मेरी नींद भी हैं तू..
मैं फिजा की शाम हूँ, रूत बहार की हैं तू..
दोस्तों के दरमियान, वजह-ए-दोस्ती है तू..
मेरी सारी उम्र में, एक ही कमी हैं तू..
~ अज़ीम आजाद
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कुछ पाना कुछ खोना जीवन में होता है।
जहाँ बहारें होती वहाँ पतझड़ होता है।
~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’
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