गुलाब की तरह ख़ुशमिज़ाज रहो।
चमकते-दमकते आफ़ताब रहो।
तुम जहां जाओ महफ़िलें लूट ल़ो।
सभी के ज़िगर में सरताज़ रहो।
~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’
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गुलाब की तरह ख़ुशमिज़ाज रहो।
चमकते-दमकते आफ़ताब रहो।
तुम जहां जाओ महफ़िलें लूट ल़ो।
सभी के ज़िगर में सरताज़ रहो।
~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’
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अगर वो कहता है तुम्हें बदलने को,
तो वो तुम्हें नहीं तुम्हारे बदले रूप को चाहता है,
होकर भी करीब तुम्हारे, वो तुम्हें अधूरा ही जान पाता है
~ Meri Pehchan
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आज इस उम्मीद पे गुज़ारी है मैंने एक शाम,
की फिर कोई शाम सिर्फ उम्मीद पे ना गुजरे ।
~ NK
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कुछ बचा ही नहीं अब खोने को,
अश्क भी निकलते नहीं अब रोने को ।
~ NK
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दरिया आग का हो या पानी का, तैरना आना चाहिए ।
नफरत हो या इश्क, करना आना चाहिए ।
~ NK
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मेरी दुआओं में शामिल तेरा ज़िक्र हर बार रहेगा,
तुझे हो ना हो, मुझे तेरा इंतजार हर पल रहेगा ।
~ NK
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मन के अंदर झांक रहा है मन मेरा।
मन की भाषा बोल रहा है मन मेरा।
मन भावों का एक समुंदर होता है।
मन चंचल है घूम रहा है मन मेरा..।
~ जितेंद्र मिश्र ‘भरत जी’
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